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कोविड की समस्या

कोविद-ए-सेहरा-ए-हिज्र में वस्ल के पल यूँ तो मुख़्तसर, वो दर पे हमारे आ तो सकते है, लेकिन पर्दानशीं होकर। अर्थात.. कोविद के मरुस्थल में, विरह की अग्नि थी उष्ण,  और मिलन का समय सीमित। ऐसे में द्वार खुले रखकर,  उन्हें घर आने की अनुमति देकर पूर्वाकांक्षा केवल इतनी ही थी,  कि वो आएं मुखावरण पहन कर।

आज सोचा ..

आज सोचा दूसरी तरफ मुँह करके भी मुस्कुरा लूँ , अब तक अपने में खुश था, आज दुनिया को भी बतला दूँ।  ग़म की परछाइयों से दूर जो आशियाँ बनाया है मैंने, आज यारों के साथ वहाँ महफ़िल सजा लूँ। 

यूंके यूँही..

 जब हम चाहते हैं कि तुम आओ, तुम  आते नहीं, जब तुम कहते हो कि आना है, हम  बुलाते  नहीं।   तुम कहते हो यहां जाना है, वहां जाना है, हम कहते हैं रुको भाई, तुम्हारा यहीं ठिकाना है।    हम तो लफ्ज़ ही ढूंढते रह गए, लिखने को ग़ज़ल इक नयी, तूने इक बात कही, वही मशहूर हो गयी।