कोविड की समस्या


कोविद-ए-सेहरा-ए-हिज्र में वस्ल के पल यूँ तो मुख़्तसर,
वो दर पे हमारे आ तो सकते है, लेकिन पर्दानशीं होकर।

अर्थात..

कोविद के मरुस्थल में,
विरह की अग्नि थी उष्ण, 
और मिलन का समय सीमित।
ऐसे में द्वार खुले रखकर, 
उन्हें घर आने की अनुमति देकर
पूर्वाकांक्षा केवल इतनी ही थी, 
कि वो आएं मुखावरण पहन कर।

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