टूटे हुए दिल की आह ना सुनी तूने, तो क्या जो वो बेआवाज़ निकली. मेरी आँखों में छिपे आंसू भी ना देख पाया तू, तो क्या जो पलकें मेरी भीगीं ना थीं. मैं तो समझा कि बहुत नज़दीक है तू मेरे, तो क्या जो ख्यालों में दूरियां निकलीं. चाहता हूँ तुझे आज भी दिलरुबा की तरह, तो क्या जो तेरे दिल में मेरे लिए नफरतें निकलीं. खुद से ना मिलने की सज़ा मुक़र्रर की है तूने... आज अपने ग़म का सबब तलाश किया जो, तो पाया की वो मेरे दिल की मजबूरी निकली.
सुबह डर गयी है, दोपहर मर गयी है शाम लापता है, रात बेगुनाह है.. इस बात का गवाह हूँ, मैं तुझसे भी खफा हूँ तुझको तो ये पता था मैं रात की दुआ हूँ.. जब तू नहीं मिली तो, मैं दिल कहाँ लगाता मैं दिन की रौशनी में, ये ग़म कहाँ छुपाता.. जब रात ने है मुझको, आकर गले लगाया सबकी नज़र से तूने, उसको भी है गिराया.. मेरी सुबह मेरी शामें, दोपहर की तू है मुजरिम मेरी रात बेगुनाह है, फिर उसको क्यों सज़ा है..
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