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कोविड की समस्या

कोविद-ए-सेहरा-ए-हिज्र में वस्ल के पल यूँ तो मुख़्तसर, वो दर पे हमारे आ तो सकते है, लेकिन पर्दानशीं होकर। अर्थात.. कोविद के मरुस्थल में, विरह की अग्नि थी उष्ण,  और मिलन का समय सीमित। ऐसे में द्वार खुले रखकर,  उन्हें घर आने की अनुमति देकर पूर्वाकांक्षा केवल इतनी ही थी,  कि वो आएं मुखावरण पहन कर।

आज सोचा ..

आज सोचा दूसरी तरफ मुँह करके भी मुस्कुरा लूँ , अब तक अपने में खुश था, आज दुनिया को भी बतला दूँ।  ग़म की परछाइयों से दूर जो आशियाँ बनाया है मैंने, आज यारों के साथ वहाँ महफ़िल सजा लूँ। 

यूंके यूँही..

 जब हम चाहते हैं कि तुम आओ, तुम  आते नहीं, जब तुम कहते हो कि आना है, हम  बुलाते  नहीं।   तुम कहते हो यहां जाना है, वहां जाना है, हम कहते हैं रुको भाई, तुम्हारा यहीं ठिकाना है।    हम तो लफ्ज़ ही ढूंढते रह गए, लिखने को ग़ज़ल इक नयी, तूने इक बात कही, वही मशहूर हो गयी। 

मेरा मित्र

आज भी है मेरी जेब में जिसका चित्र, वो तो है एक बहुत ही पुराना मित्र। एक शाम जब पार्क में खेल रहे थे, तो किसी बात पर वो मुझसे रूठ गया। कुछ देर पहले ही जिससे हंस-बोल रहे थे, उस पल लगा कि वो मुझसे छूट गया। पर अगली सुबह जब स्कूल में हम मिले, तो मुझे देख कर वो ज़ोर से हंस पड़ा। कल शाम का झगड़ा हम दोनों ही भूले, और अबकी बार मैं किसी बात पर उससे लड़ा। मेरे पापा का अब यहां ट्रांसफर हुआ है , ये शहर तो मेरे लिए बिलकुल नया है। बहुत से नए दोस्त अब मैंने बनाए  हैं, पर बचपन के पुराने साथी अब तक नहीं भुलाए हैं। इसीलिए आज भी है मेरी जेब में उसका चित्र, वो तो है मेरा एक बहुत ही पुराना मित्र।

आंसू..

आँखों से बहते नहीं दिल ही में रह जाते हैं आंसू बड़े महँगे  हैं ये खुल कर कुछ भी कहते नहीं रात को व्यथा सुनाते हैं आंसू बड़े शर्मीले हैं ये दुःख से हैं अनजान नहीं पर पलकों पे रुक जाते हैं आंसू बड़े सजीले हैं ये कभी कभी जब खुश होता हूँ हँसते हुए ही अक्सर आंसू क्यों आ जाते हैं ये.. 

एक नयी सुबह फिर होने को है

ये रात अब ख़त्म होने को है एक नयी सुबह फिर होने को है इस रात में जला दिए हैं मैंने कई अफ़साने एक काली चादर से ढक दिए हैं अपने ग़म के बहाने सफ़ेद चांदनी से धो दिए हैं गुनाह सब पुराने खुद से अब कोई जिरह नहीं है बाकी ना ही शराब है और ना कोई साक़ी दे चूका हूँ जितनी देनी थी खुद को सज़ा अब जीने को जी चाहता है इसलिए इंतेजा है ये तुझसे, ऐ क़ज़ा लौट जा तू सितारों में फिर से तुझसे जो इश्क़ मैंने किया था कभी उसकी मियाद अब ख़त्म होने को है एक नयी सुबह फिर होने को है.. 

मर गया आज एक और कहीं

मर गया आज एक और कहीं खो गया लाशों के ढेर में खून से सरोबार उस चेहरे पर अब डर के सिवा कुछ भी नहीं कुछ कर जाने की ख्वाहिश दिल में लिए सपनों की उड़ान भरने को तैयार निकला वो अनजान सड़कों पे की अचानक हुआ मौत का वार थम गया सब रुक गयी हवाएँ कैसा मंज़र तुम्हें क्या बताएं बिखरे फूल उठाने को भी कोई नहीं खून से सरोबार उस चेहरे पर अब डर के सिवा कुछ भी नहीं