Posts

Showing posts from January, 2017

आंसू..

आँखों से बहते नहीं दिल ही में रह जाते हैं आंसू बड़े महँगे  हैं ये खुल कर कुछ भी कहते नहीं रात को व्यथा सुनाते हैं आंसू बड़े शर्मीले हैं ये दुःख से हैं अनजान नहीं पर पलकों पे रुक जाते हैं आंसू बड़े सजीले हैं ये कभी कभी जब खुश होता हूँ हँसते हुए ही अक्सर आंसू क्यों आ जाते हैं ये.. 

एक नयी सुबह फिर होने को है

ये रात अब ख़त्म होने को है एक नयी सुबह फिर होने को है इस रात में जला दिए हैं मैंने कई अफ़साने एक काली चादर से ढक दिए हैं अपने ग़म के बहाने सफ़ेद चांदनी से धो दिए हैं गुनाह सब पुराने खुद से अब कोई जिरह नहीं है बाकी ना ही शराब है और ना कोई साक़ी दे चूका हूँ जितनी देनी थी खुद को सज़ा अब जीने को जी चाहता है इसलिए इंतेजा है ये तुझसे, ऐ क़ज़ा लौट जा तू सितारों में फिर से तुझसे जो इश्क़ मैंने किया था कभी उसकी मियाद अब ख़त्म होने को है एक नयी सुबह फिर होने को है.. 

मर गया आज एक और कहीं

मर गया आज एक और कहीं खो गया लाशों के ढेर में खून से सरोबार उस चेहरे पर अब डर के सिवा कुछ भी नहीं कुछ कर जाने की ख्वाहिश दिल में लिए सपनों की उड़ान भरने को तैयार निकला वो अनजान सड़कों पे की अचानक हुआ मौत का वार थम गया सब रुक गयी हवाएँ कैसा मंज़र तुम्हें क्या बताएं बिखरे फूल उठाने को भी कोई नहीं खून से सरोबार उस चेहरे पर अब डर के सिवा कुछ भी नहीं

वो भीड़ में अकेला खून से लथपथ..

आज फिर देखा मैंने उसे सड़क पर पड़े हुए खुद से ही गिर गया था या टकरा गया था किसी से शायद कुछ लोग खड़े थे उसके इर्द गिर्द पर छूने से डर रहे थे शायद वो भीड़ में अकेला खून से लथपथ मुझे ही ढूंढ रहा था शायद मैं उसके पास से ही गुज़र रहा था मैंने इक नज़र देखा भी उसे पर अनदेखा कर, चल दिया अपनी राह वो आँखें अब भी मुझे ढूंढ रही हों शायद यही सोच रहा था रात भर से आँखें बंद करने से भी डर रहा था उसे दर्द बहुत हो  रहा था देख के बता सकता था मैं पर ये जान भी अनजान बना रहा जल रहा हूँ अब रातों में सोच सोच कर ये की वो भीड़ में अकेला खून में लथपथ मुझे ही ढूंढ रहा था शायद 

मेरी रात बेगुनाह है, फिर उसको क्यों सज़ा है..

सुबह डर गयी है,   दोपहर मर गयी है शाम लापता है, रात बेगुनाह है.. इस बात का गवाह हूँ, मैं तुझसे भी खफा हूँ तुझको तो ये पता था मैं रात की दुआ हूँ.. जब तू नहीं मिली तो, मैं दिल कहाँ लगाता मैं दिन की रौशनी में, ये ग़म कहाँ छुपाता.. जब रात ने है मुझको, आकर गले लगाया सबकी नज़र से तूने, उसको भी है गिराया.. मेरी सुबह मेरी शामें, दोपहर की तू है मुजरिम मेरी रात बेगुनाह है, फिर उसको क्यों सज़ा है.. 

अधूरे ख्वाब...

इश्क़ के समंदर से, एक बूँद ही सही, तूने मेरे नाम की, मुझको ज़िन्दगी दे दी । वक़्त की किताब के, जितने खाली पन्ने  थे, इश्क़ की सियाही से, वो भी पूरे भर गए । ख्वाब जो अधूरे थे, आज पूरे हो गए, दिल से दिल हैं मिल गए, आप हमारे हो गए । 

मंजिल तू कहाँ है

क्या राह क्या मंजिल मैं जानता नहीं, जानना चाहता भी नहीं. भ्रम है या सच पर शायद ये जानता हूँ, की ज़िन्दगी राह है और मौत मंजिल, ये दोस्त तो बस पड़ाव हैं, चाहता था मैं एक पेड़ जिसकी छाँव में, दो पल चैन की सांस ले सकूं पर, चल रहा हूँ अकेला इस रेगिस्तान में. प्यासा हूँ पर पानी नहीं है, झुलस रहा हूँ पर छाँव नहीं है, कब तक चलूँ अब आस नहीं है. मंजिल तू कहाँ है, तू कहाँ है, तू कहाँ है.....

मेरे दिल को है बस तेरा इंतज़ार

मेरे दिल को है बस तेरा इंतज़ार, कब आयेगी तू, तेरे लिए हूँ बेकरार. ज़िन्दगी में तो सब कुछ देख लिया, सब सुख देखे, सब स्वाद चखे, दुःख भी देखे आँसू भी बहाए. बची तो सिर्फ तू, तेरा मज़ा ही है बाकी, कभी आना मेरे पास तो अपना एहसास दिलाना, पल पल तुझे महसूस करना चाहता हूँ, एक एक लम्हा तुझसे लड़ना चाहता हूँ. हार गया गर तुझसे तो वादा है ये मेरा, सवाल नहीं करूंगा कुछ भी, बस चलूँगा तेरे साथ. छोड़ दूंगा इस प्रियतमा ज़िन्दगी का हाथ. तू आ ऐ क़ज़ा तेरा ही है इंतज़ार, कब आयेगी तू, तेरे लिए हूँ बेकरार.

टूटे हुए दिल की आह ना सुनी तूने

टूटे हुए दिल की आह ना सुनी तूने, तो क्या जो वो बेआवाज़ निकली. मेरी आँखों में छिपे आंसू भी ना देख पाया तू, तो क्या जो पलकें मेरी भीगीं ना थीं. मैं तो समझा कि बहुत नज़दीक है तू मेरे, तो क्या जो ख्यालों में दूरियां निकलीं. चाहता हूँ तुझे आज भी दिलरुबा की तरह, तो क्या जो तेरे दिल में मेरे लिए नफरतें निकलीं. खुद से ना मिलने की सज़ा मुक़र्रर की है तूने... आज अपने ग़म का सबब तलाश किया जो, तो पाया की वो मेरे दिल की मजबूरी निकली.

मेरा ख्वाब

कौन कहता है ज़िन्दगी एक हसीन ख्वाब है, मैंने कल ही उसे रोते हुए देखा था. उसने कहा की मैं ख्वाब नहीं देखूंगी अब कोई, किस्मत की लकीरों को सच मान कर जिंदा रह लूंगी. बीती बातें झूठा सपना थी जो टूट गया आँखों के खुलते ही, संजो के रखा था कब से जो पलकों पर मैंने, आज आंसुओं के साथ बह जाने दूँगी. ज़िन्दगी एक हसीन ख्वाब है, सुना था मैंने भी कहीं, पर सपने सच भी होते हैं कभी देखा नहीं था. आज फिर एक सपना बुना है मैंने, उसकी आँखों पर भी सजा दिया है उसे. इस बार ये ख्वाब टूटेगा नहीं, इस बार ये दिल रूठेगा नहीं, इस बार मैं खुल के हंसूंगी, लहरों में स्वछन्द बहूंगी.

मुझे रात के साये निगल रहे हैं ।

मुझे रात के साये निगल रहे हैं ।  मैं अंधेरों से गुज़र चुका था, मगर इन सायों की आँतों में अँधेरे इतने घने होंगे, इसका मुझे अंदाज़ा नहीं था । इन घने अंधेरों में डर से ज़्यादा दर्द होता है, चारों तरफ बस गर्द ही गर्द होता है । ये साये मुझे अपने अंदर गलाये जाते हैं, पहले ये जिस्म ज़र्द होता है, फिर रूह ज़र्द होती है, जब रूह रूह हो जाती है, तब जिस्म ख़ाक होता है । अब दर्द नहीं रहा है बाकी कोई, मुझे रात के साये निगल चुके हैं, अब इन अंधेरों में भी मैं देख सकता हूँ ।