मेरी रात बेगुनाह है, फिर उसको क्यों सज़ा है..

सुबह डर गयी है,   दोपहर मर गयी है
शाम लापता है, रात बेगुनाह है..

इस बात का गवाह हूँ, मैं तुझसे भी खफा हूँ
तुझको तो ये पता था मैं रात की दुआ हूँ..

जब तू नहीं मिली तो, मैं दिल कहाँ लगाता
मैं दिन की रौशनी में, ये ग़म कहाँ छुपाता..

जब रात ने है मुझको, आकर गले लगाया
सबकी नज़र से तूने, उसको भी है गिराया..

मेरी सुबह मेरी शामें, दोपहर की तू है मुजरिम
मेरी रात बेगुनाह है, फिर उसको क्यों सज़ा है.. 

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