मंजिल तू कहाँ है

क्या राह क्या मंजिल मैं जानता नहीं,
जानना चाहता भी नहीं.
भ्रम है या सच पर शायद ये जानता हूँ,
की ज़िन्दगी राह है और मौत मंजिल,
ये दोस्त तो बस पड़ाव हैं,
चाहता था मैं एक पेड़ जिसकी छाँव में,
दो पल चैन की सांस ले सकूं पर,
चल रहा हूँ अकेला इस रेगिस्तान में.
प्यासा हूँ पर पानी नहीं है,
झुलस रहा हूँ पर छाँव नहीं है,
कब तक चलूँ अब आस नहीं है.
मंजिल तू कहाँ है, तू कहाँ है, तू कहाँ है.....

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