वो भीड़ में अकेला खून से लथपथ..

आज फिर देखा मैंने उसे
सड़क पर पड़े हुए
खुद से ही गिर गया था
या टकरा गया था किसी से शायद

कुछ लोग खड़े थे उसके इर्द गिर्द
पर छूने से डर रहे थे शायद
वो भीड़ में अकेला खून से लथपथ
मुझे ही ढूंढ रहा था शायद

मैं उसके पास से ही गुज़र रहा था
मैंने इक नज़र देखा भी उसे
पर अनदेखा कर, चल दिया अपनी राह

वो आँखें अब भी मुझे ढूंढ रही हों शायद
यही सोच रहा था रात भर से
आँखें बंद करने से भी डर रहा था

उसे दर्द बहुत हो  रहा था
देख के बता सकता था मैं
पर ये जान भी अनजान बना रहा
जल रहा हूँ अब रातों में सोच सोच कर ये

की वो भीड़ में अकेला खून में लथपथ
मुझे ही ढूंढ रहा था शायद 

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