मुझे रात के साये निगल रहे हैं ।

मुझे रात के साये निगल रहे हैं । 
मैं अंधेरों से गुज़र चुका था,
मगर इन सायों की आँतों में अँधेरे इतने घने होंगे,
इसका मुझे अंदाज़ा नहीं था ।
इन घने अंधेरों में डर से ज़्यादा दर्द होता है,
चारों तरफ बस गर्द ही गर्द होता है ।
ये साये मुझे अपने अंदर गलाये जाते हैं,
पहले ये जिस्म ज़र्द होता है, फिर रूह ज़र्द होती है,
जब रूह रूह हो जाती है, तब जिस्म ख़ाक होता है ।
अब दर्द नहीं रहा है बाकी कोई,
मुझे रात के साये निगल चुके हैं,
अब इन अंधेरों में भी मैं देख सकता हूँ । 

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